पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त (Piaget’s Cognitive Development Theory)

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (Piaget Cognitive Development Theory) बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र (CDP) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। जीन पियाजे एक प्रसिद्ध स्विस मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने बच्चों के बौद्धिक एवं संज्ञानात्मक विकास पर महत्वपूर्ण शोध किया। CTET, UPTET, Super TET, KVS, DSSSB तथा B.Ed. जैसी परीक्षाओं में इस सिद्धांत से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। इस लेख में पियाजे के सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ, चार अवस्थाएँ, शैक्षिक निहितार्थ, आलोचना तथा महत्वपूर्ण प्रश्नों की विस्तृत जानकारी दी गई है।

Table of Contents

पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ

पियाजे के अनुसार बालक ज्ञान का निष्क्रिय ग्रहणकर्ता नहीं होता, बल्कि वह अपने अनुभवों के आधार पर स्वयं ज्ञान का निर्माण करता है। उनके सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. बालक सक्रिय अधिगमकर्ता होता है।
  2. विकास क्रमिक एवं चरणबद्ध होता है।
  3. प्रत्येक अवस्था की अपनी विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं।
  4. बालक अपने अनुभवों के आधार पर ज्ञान का निर्माण करता है।
  5. संज्ञानात्मक विकास वातावरण एवं परिपक्वता दोनों से प्रभावित होता है।
  6. सीखना आत्मसात (Assimilation) और समायोजन (Accommodation) की प्रक्रिया से होता है।

आत्मसात, समायोजन एवं संतुलन

आत्मसात (Assimilation)

जब बालक किसी नए अनुभव को अपने पूर्व ज्ञान के अनुसार समझने का प्रयास करता है तो उसे आत्मसात कहते हैं।

समायोजन (Accommodation)

जब नया अनुभव पुराने ज्ञान से मेल नहीं खाता और बालक अपने ज्ञान में परिवर्तन करता है तो उसे समायोजन कहते हैं।

संतुलन (Equilibration)

आत्मसात और समायोजन के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया को संतुलन कहा जाता है।

पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त की 4 अवस्थाएँ (4 Stages of Piaget cognitive development theory)

पियाज़े के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत को 4 मुख्य अवस्थाओं में बाँटा गया है –

अवस्थाआयु
इंद्रियजनित गामक0-2 वर्ष
पूर्व संक्रियात्मक2-7 वर्ष
मूर्त संक्रियात्मक7-11 वर्ष
अमूर्त संक्रियात्मक11-15 वर्ष

(1) इन्द्रीयजनित गामक अवस्था(Sensory – motor stage)

यह अवस्था जन्म से 2 वर्ष की अवधि में पूरी होती है। इस अवस्था में वह अपनी मानसिक क्रियाओं को अपनी इंद्रिय जनित का क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है।

शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर करना किसी चीज को पकड़ना, अपने भावों को रोककर व्यक्त करना ,जो चाहिए, उसे दिखाकर अपनी बात कहना इसके प्रमुख लक्षण है।

इस अवस्था में किसी वस्तु का अस्तित्व तब तक रहता है। जब तक कि बालक के सामने वह वस्तु उपस्थित रहती है।

(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage)

यह अवस्था 2 से 7 वर्ष की होती है। इसमें भाषा का विकास ठीक प्रकार से प्रारंभ हो जाता है। इसमें किसी बात की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा होता है।

बालक इस अवस्था में संप्रत्यय निर्माण करने लगता है। बालक वस्तुओं को पहचानना और उसमें विभेद करने लगता है । परंतु किसी वस्तु के संदर्भ में संप्रत्यय निर्माण अधूरा व दोषपूर्ण होता है।

इस अवस्था में बालक सजीव और निर्जीव में भेद करने लगता है।

इस अवस्था के दो प्रमुख दोष निम्न में हैं

(1)जीववाद(Animism) :

जीववाद बालकों के चिंतन में पाए जाने वाला वह दोष है। जिसमे वह निर्जीव को सजीव समझता है।

जैसे- पंखा , कार, बादल सभी को सजीव समझता है।

(2) आत्मकेंद्रीयता:

बालक के विचार में व्यक्तिनिष्ठता पाई जाती है। वह सिर्फ अपने विचार को ही सत्य मान्यता है।

जैसे वह यह मानता है कि जैसे जैसे वह दौड़ता है वैसे वैसे सूर्य भी तेज दौड़ने लगता है। यह दोनों दोष से 2- 4 वर्ष की अवधि में पाए जाते हैं।

4-7 वर्ष में बालको का चिंतन पहले से अधिक परिपक्व हो जाता है। परंतु चिंतन में उत्क्रमणीय गुण नहीं होती।

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था:(Concrete operational stage)

यह अवस्था 7 से 11 वर्ष तक होते हैं।इस अवस्था में बालक वस्तुओं को पहचानना, विभेद करना ,वर्गीकरण द्वारा समझना सीख जाता है।

परंतु बालक उनका समस्या समाधान अमूर्त आधार पर नहीं कर पाता है। बल्कि वह उसका समाधान स्थूल या मूर्त कर पाता है।

अगर कोई व्यक्ति किसी समस्या को समझा रहा है। तो वह उस समस्या को नहीं समझ पायेगा। वह किसी समस्या को देख कर ही समझ पाता है।

(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था(Formal operational stage)

यह अवस्था 11 से 15 वर्ष के बीच होती है इसमें किशोरों का चिंतन अधिकतम लचीला व प्रभावी हो जाता है। चिंतन में क्रमबद्धता पाई जाती हैं। चिंतन में वस्तुनिष्ठता व वास्तविकता पाई जाती है। अवस्था में बालक में विकेंद्रीकरण पूर्णतः विकसित हो जाता है।

पियाजे के सिद्धांत के शैक्षिक निहितार्थ

1. शिक्षण बालक केंद्रित होना चाहिए।

2. सीखने की प्रक्रिया में गतिविधियों को महत्व दिया जाना चाहिए।

3. बालकों को स्वयं खोजकर सीखने के अवसर मिलने चाहिए।

4. शिक्षक की भूमिका मार्गदर्शक की होनी चाहिए।

5. शिक्षण बालक की आयु एवं मानसिक स्तर के अनुसार होना चाहिए।

6. अनुभव आधारित शिक्षण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

पियाजे के सिद्धांत की आलोचना

1. पियाजे ने सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।

2. विकास की आयु सीमाएँ सभी बच्चों पर समान रूप से लागू नहीं होतीं।

3. कुछ शोधों में पाया गया कि बच्चे पियाजे द्वारा बताए गए समय से पहले कुछ क्षमताएँ विकसित कर लेते हैं।

4. सिद्धांत मुख्य रूप से अवलोकन पर आधारित था।

CTET में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. पियाजे के अनुसार संज्ञानात्मक विकास की कितनी अवस्थाएँ हैं?

उत्तर: चार

प्रश्न 2. आत्मकेंद्रीयता किस अवस्था की विशेषता है?

उत्तर: पूर्व संक्रियात्मक अवस्था

प्रश्न 3. जीववाद किस अवस्था में पाया जाता है?

उत्तर: पूर्व संक्रियात्मक अवस्था

प्रश्न 4. वस्तु स्थायित्व (Object Permanence) किस अवस्था में विकसित होता है?

उत्तर: इंद्रियजनित गामक अवस्था

प्रश्न 5. अमूर्त चिंतन किस अवस्था में विकसित होता है?

उत्तर: अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था

CTET, UPTET तथा अन्य शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थी CTET Notes PDF in Hindi भी पढ़ सकते हैं, जहाँ विषयवार नोट्स, सिलेबस और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र उपलब्ध हैं।

CTET परीक्षा में पियाजे सिद्धांत का महत्व

CTET, UPTET, Super TET तथा अन्य शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में पियाजे सिद्धांत से प्रतिवर्ष प्रश्न पूछे जाते हैं। विशेष रूप से आत्मकेंद्रीयता, जीववाद, वस्तु स्थायित्व तथा चार अवस्थाओं से संबंधित प्रश्न बार-बार दोहराए जाते हैं।

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत – FAQs

Q1. पियाजे कौन थे?

 उत्तर: जीन पियाजे एक स्विस मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत प्रतिपादित किया।

Q2. पियाजे के अनुसार संज्ञानात्मक विकास की कितनी अवस्थाएँ हैं?

उत्तर: चार अवस्थाएँ – इंद्रियजनित गामक, पूर्व संक्रियात्मक, मूर्त संक्रियात्मक और अमूर्त संक्रियात्मक।

Q3. आत्मकेंद्रीयता किस अवस्था की विशेषता है?

उत्तर: पूर्व संक्रियात्मक अवस्था।

Q4. जीववाद क्या है?

उत्तर: निर्जीव वस्तुओं को सजीव समझने की प्रवृत्ति को जीववाद कहते हैं।

Q5. CTET में पियाजे सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: CTET, UPTET, Super TET तथा अन्य शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में पियाजे सिद्धांत से नियमित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं।

निष्कर्ष

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह सिद्धांत बताता है कि बालक का बौद्धिक विकास विभिन्न चरणों में होता है और प्रत्येक चरण की अपनी विशेषताएँ होती हैं। आत्मसात, समायोजन और संतुलन जैसी अवधारणाएँ इस सिद्धांत की आधारशिला मानी जाती हैं। CTET, UPTET, Super TET, KVS तथा अन्य शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए इस सिद्धांत का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इससे संबंधित प्रश्न लगभग हर वर्ष पूछे जाते हैं।

Leave a Reply