Kohlberg Theory in Hindi | कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत

Kohlberg Theory in Hindi (कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत) बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र (CDP) का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। लॉरेन्स कोहलबर्ग के अनुसार नैतिक विकास चरणबद्ध रूप से होता है और यह व्यक्ति की नैतिक तर्कशक्ति (Moral Reasoning) पर आधारित होता है। CTET, UPTET, Super TET, KVS, DSSSB तथा B.Ed. जैसी परीक्षाओं में इस सिद्धांत से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। इस लेख में कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत, तीन स्तर, छह अवस्थाएँ, प्रमुख विशेषताएँ, शैक्षिक निहितार्थ, आलोचना तथा CTET के महत्वपूर्ण प्रश्नों की जानकारी दी गई है।

Table of Contents

कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत क्या है?

कोहलबर्ग के अनुसार नैतिक विकास व्यक्ति की नैतिक तर्कशक्ति (Moral Reasoning) पर आधारित होता है और यह तीन स्तरों तथा छह अवस्थाओं में क्रमिक रूप से विकसित होता है।

कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत का परिचय

लॉरेन्स कोहलबर्ग ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन ऐसे बच्चों से प्राप्त तथ्यों के विश्लेषण के पश्चात् किया, जिनकी आयु 10 से 16 वर्ष के मध्य थी। इनकी बाल केन्द्रित शिक्षा नैतिक विकास पर आधारित है। लारेन्स कोहलबर्ग की अवधारणा है कि बालक के नैतिक विकास की प्रकृति या स्थान को समझने हेतु उसके तर्क एवं चिन्तन के स्वरूप को समझना आवश्यक है। नैतिकता का सही अनुमान एवं आकलन बालक द्वारा की गई प्रतिक्रियाओं के आधार पर ज्ञात किया जा सकता है। 

कुछ ऐसी दशाएँ होती हैं, जिनमें इच्छित या प्रत्याशित व्यवहार का प्रदर्शन बालकों में भय या दण्ड या पुरस्कार के प्रलोभन के कारण होता है। वे वांछित व्यवहार नैतिक निर्णय एवं नैतिक स्थिति के कारण नहीं होते हैं। परन्तु इस नैतिक व्यवहार के अध्ययन द्वारा कोहलबर्ग ने बालक को किसी धर्म संकट या कशमकश की परिस्थिति में रखकर, बालक उस परिस्थिति में क्या सोचता है और किस तर्क के आधार पर निर्णय लेता है? 

इस उपागम को प्राणीगत उपागम का नाम दिया। इसके पीछे तर्क यह था कि निर्णय लेने की क्षमता पर्यावरण से नहीं वरन् अपनी तर्कशक्ति के कारण होता है। कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धान्त को अवस्था सिद्धान्त भी कहा जाता है, क्योंकि कोहलबर्ग ने विकास के हेतु अवस्थाओं पर बल दिया।

कोहलबर्ग के नैतिक विकास की अवस्थाएँ (Stages of Moral Development)


नैतिक विकास की कुल छह अवस्थाओं को तीन स्तर पद दो-दो अवस्थाओं के साथ विभाजित किया गया है। ये अवस्थायें निम्न हैं-

1. पूर्व लौकिक स्तर (Pre-conventional Level)

यह अवस्था 4 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक होती है। इस अवस्था में नैतिक तर्कणा (moral reason) दूसरे लोगों के मानकों (standards) से निर्धारित होता है, न कि सही या गलत के अपने आंतरिक मानकों (Internalized standards) के द्वारा। बच्चे यहाँ किसी भी व्यवहार को अच्छा या बुरा, उसके भौतिक परिणामों के आधार पर कहते हैं। इसके अंतर्गत दो अवस्थाएँ होती हैं-

(a) आज्ञा एवं दण्ड की अवस्था (Obedience and Punishment Stage) ।
(b) अहंकार की अवस्था (Stage of Naive Hedoneous) ।

(a) आज्ञा एवं दण्ड की अवस्था (Obedience and Punishment Stage) 

अच्छा या बुरा कार्य पूरी तरह से उसके परिणाम पर निर्भर करता है। बालक दण्ड के भय से बड़ों की आज्ञा का पालन करता है लेकिन किसी गलत क्रिया को गलत नहीं मान सकता है। यदि यह क्रिया पहचानी न जाये और दण्डित न की जाए। क्रिया जितनी गलत होगी, दण्ड भी उतना ही कठोर होगा। 

इस तरह से प्रारम्भिक अवस्था में दण्ड को ही बच्चों ने नैतिकता का आधार माना है। साधारण शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जिस क्रिया को करने पर बच्चों को दण्डित नहीं किया जाता है उसे वह नैतिकता से जोड़ लेता है।

(b) अहंकार की अवस्था (Stage of Naive Hedoneous) 

इस अवस्था में बालक अपनी आवश्यकताओं को समझने लगता है। इस अवस्था में बालक कुछ ऐसे कार्य करता है जिसके द्वारा उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इन कार्यों को करना उसे अच्छा लगता है। नैतिक विकास की इस अवस्था को बालक का अहंकार अथवा उसकी अपनी इच्छा में आवश्यकताएँ उसकी नैतिक तर्क शक्ति का आधार बनाती हैं।

2. लौकिक स्तर (Conventional Level)

यह अवस्था दो वर्गों में विभाजित है–

(a) प्रशंसा की अवस्था (Stage of Praise)

इस अवस्था में बालक वही कार्य करता है। जिसका परिणाम उसे प्रशंसा प्रदान करता है एवं उसके कार्यों को समाज के लोग अनुमोदित करते हैं। इस अवस्था तक उसे प्रशंसा एवं निन्दा का अर्थ समझ में आ जाता है। बालक एवं बालिका इस अवस्था में यौनोचित एवं समाज द्वारा अनुमोदित व्यवहार करना सीख जाते हैं। 

स्वीकृति एवं अनुमोदित व्यवहार करने पर प्रशंसा मिलती है तथा इसके विपरीत व्यवहार करने पर बालकों को दण्ड मिलता है या फिर उनकी निन्दा की जाती है।

(b) सामाजिक व्यवस्था के प्रति सम्मान की अवस्था (Stage of Maintaining Social Orders) 

यह अवस्था अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था होती है। कोहलबर्ग के अनुसार, समाज के लोग इस में प्रवेश पाते हैं। इस अवस्था में बालक सामाजिक रीति-रिवाज, मूल्यों,नियमों,प्रथाओं एवं लौकिक क्रियाओं से अवगत हो जाता है। 

इनके प्रति उसका विश्वास एवं आस्था अटूट हो जाती है। उसमें कर्तव्य की भावना का विकास हो जाता है तथा वह समझने लगता है कि कौन-सा कार्य अच्छा है और कौन-सा कार्य अच्छा नहीं है।

3. पश्चात् लौकिक स्तर (Post-conventional level)

इस अवस्था में बच्चों में नैतिक अवस्था पूर्णतः आंतरिक नियंत्रण (internal control) में होती है। यह नैतिकता का सबसे उच्च स्तर होता है। इसमें नैतिकता का ज्ञान बच्चों में होता है। यह दो वर्गों में विभाजित है-

(a) समझौता, वैयक्तिक अधिकारों एवं प्रजातांत्रिक रूप से स्वीकृत नियमों की अवस्था- 

यह अवस्था सामाजिक समझौतों की अवस्था होती है। इस अवस्था में वह यह समझने लगता है कि व्यक्ति और समाज के मध्य एक प्रकार का समझौता करना पड़ता है जिसके तहत व्यवहार प्रदर्शन होता है। समाज के द्वारा अनुमोदित नियमों का पालन इसलिए करना पड़ता है क्योंकि वह समाज के हित में रहता है। 

वस्तुतः सामाजिक नियमों, प्रथाओं, रीति-रिवाजों एवं प्रजातांत्रिक रूप से स्वीकृत नियमों के द्वारा व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान की जाती है। अतः इन नियमों का उल्लंघन करना अनैतिक आचरण कहलाता है।

(b) विवेक की अवस्था (Stage of Conscience) 

यह नैतिकता की पराकाष्ठा की अवस्था होती है। बालकों के नैतिक व्यवहार विवेकपूर्ण होते हैं। इस अवस्था में वह अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित, वांछित-अवांछित व्यवहारों एवं कृत्यों के सम्बन्ध में अपना व्यक्तिगत विचार रखने लगता है। 

इस अवस्था में नैतिक व्यवहार का आधार उसका अपना विवेक होता है। कोहलबर्ग का सिद्धान्त जीन पियाजे, जॉन डीवी तथा जेम्स मार्क बाल्डविन के सिद्धान्तों से प्रेरित है। कोहलबर्ग का विश्वास भी था और उन्होंने अध्ययनों से सिद्ध भी किया कि विकास एक चरणबद्ध प्रकिया है।


उनके मानव विकास सम्बंधी विचार निम्नलिखित हैं-

(i) विकास सामाजिक नियमों को प्राप्त करने की प्रक्रिया है।
(ii) विकास निश्चित दिशा में तथा निश्चित चरणों में सम्पन्न होने वाली प्रक्रिया है।
(iii) सामाजिक नियमों के प्रति अनुक्रिया से नैतिकता का विकास होता है।
(iv) विकास सामाजिक उपयोगिता पाने की प्रक्रिया है।
(v) विकास एक सतत प्रक्रिया है।

कोहलबर्ग के तीन स्तर एवं छह अवस्थाएँ

स्तरअवस्थामुख्य विशेषता
पूर्व-परंपरागतआज्ञा एवं दण्डदण्ड से बचना
पूर्व-परंपरागतस्वहितलाभ के आधार पर निर्णय
परंपरागतअच्छा बच्चाप्रशंसा प्राप्त करना
परंपरागतकानून एवं व्यवस्थानियमों का पालन
उत्तर-परंपरागतसामाजिक अनुबंधसमाज के हित को प्राथमिकता
उत्तर-परंपरागतसार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतविवेक के आधार पर निर्णय

हेंज दुविधा (Heinz Dilemma)

कोहलबर्ग ने नैतिक विकास का अध्ययन करने के लिए “हेंज दुविधा” (Heinz Dilemma) का प्रयोग किया। इसमें एक व्यक्ति की पत्नी गंभीर रूप से बीमार होती है। जीवनरक्षक दवा बहुत महंगी होने के कारण वह उसे खरीद नहीं पाता। ऐसी स्थिति में क्या हेंज को दवा चोरी कर लेनी चाहिए या नहीं? कोहलबर्ग के अनुसार इस प्रश्न का सही या गलत उत्तर महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति अपने निर्णय के पीछे क्या तर्क देता है। इसी तर्क के आधार पर नैतिक विकास के स्तर का आकलन किया जाता है।

कोहलबर्ग सिद्धांत के प्रमुख घटक

  • Moral Reasoning (नैतिक तर्कशक्ति)
  • Heinz Dilemma (हेंज दुविधा)
  • Stage Theory (अवस्था सिद्धांत)
  • Moral Judgement (नैतिक निर्णय)
  • Three Levels and Six Stages (3 स्तर एवं 6 अवस्थाएँ)

कोहलबर्ग के सिद्धान्त की सीमाएँ (Limitations of Kohlberg Theory)

कोहलबर्ग द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त की सीमाएँ निम्न हैं –

1.इस सिद्धान्त की सबसे प्रमुख सीमा है कि इसमें वास्तविक व्यवहार की अवस्था की अपेक्षा तार्किकता पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

2. यह एक सामान्य अन्वेषण है, इसमें प्रत्येक अवस्था के बालक के आस-पास जब प्रेक्षक न हो, तो वे अपने साथी आयु वर्ग की नकल करते हैं या उन्हें उत्तर बताते हैं या फिर प्रेक्षक प्रत्येक बालक को ईमानदारी से व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित करता है और बेईमानी से व्यवहार करने वाले कुछ बालकों को हतोत्साहित कर सकता है। 

यह दर्शाता है कि एक बालक का नैतिक व्यवहार बहुत कमजोर हो सकता है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त, स्विस मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे एवं अमेरिकी दार्शनिक जॉन डीवी के विचारों पर आधारित है। ये जेम्स मार्क वाल्डविन से भी प्रभावित थे। इन्होंने मानव विकास के अस्तित्व को महत्व प्रदान किया। 

इन्होंने दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक पद्धति के प्रगतिशील तत्वों को मानव विकास हेतु अपने विचारों में समंजित किया। कोहलबर्ग मानव के विकास में उन्नति हेतु नैतिक तर्क (परम्परागत व्यवहार का आधार) के अध्ययन का सर्वत्र निरूपण किया है। इसीलिए इन्होंने सामान्यतया व्यक्ति के विकास को छह अवस्थाओं एवं तीन स्तरों में विभाजित किया है।

कोहलबर्ग सिद्धांत का शैक्षिक महत्व एवं निहितार्थ

कोहलबर्ग सिद्धांत का शैक्षिक महत्व

  • विद्यार्थियों में नैतिक तर्कशक्ति का विकास करता है।
  • सही और गलत का निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है।
  • मूल्य आधारित शिक्षा को प्रोत्साहित करता है।
  • सहयोग, ईमानदारी एवं सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करता है।
  • नैतिक दुविधाओं पर विचार करने की क्षमता विकसित करता है।

कोहलबर्ग सिद्धांत के शैक्षिक निहितार्थ

1. विद्यार्थियों में नैतिक निर्णय लेने की क्षमता का विकास किया जाना चाहिए।

2. कक्षा में नैतिक दुविधाओं (Moral Dilemmas) पर चर्चा करानी चाहिए।

3. शिक्षक को केवल नियमों का पालन कराने के बजाय सही-गलत के कारण समझाने चाहिए।

4. सहयोगात्मक अधिगम एवं समूह चर्चा को बढ़ावा देना चाहिए।

5. विद्यार्थियों में जिम्मेदारी, ईमानदारी और सामाजिक मूल्यों का विकास करना चाहिए।

6. नैतिक शिक्षा को व्यवहार से जोड़कर पढ़ाना चाहिए।

कोहलबर्ग सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ

1. नैतिक विकास चरणबद्ध प्रक्रिया है।

2. कुल 3 स्तर एवं 6 अवस्थाएँ हैं।

3. नैतिक विकास का आधार Moral Reasoning है।

4. यह सिद्धांत पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत से प्रभावित है।

5. प्रत्येक अवस्था पूर्व अवस्था पर आधारित होती है।

6. सभी व्यक्ति अंतिम अवस्था तक नहीं पहुँचते।

CTET Exam Point

  • कुल स्तर = 3
  • कुल अवस्थाएँ = 6
  • Moral Reasoning
  • Heinz Dilemma
  • Piaget से प्रभावित
  • Stage Theory
  • अंतिम अवस्था तक सभी व्यक्ति नहीं पहुंचते

पियाजे और कोहलबर्ग में अंतर

आधारपियाजेकोहलबर्ग
विकाससंज्ञानात्मकनैतिक
आधारबुद्धिनैतिक तर्क
अवस्थाएँ46
प्रमुख विषयसोचसही-गलत का निर्णय

 कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत – FAQs

Q1. कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?

उत्तर: कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत (Kohlberg Theory of Moral Development) का प्रतिपादन अमेरिकी मनोवैज्ञानिक लॉरेन्स कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg) ने किया था। उन्होंने बताया कि नैतिक विकास व्यक्ति की नैतिक तर्कशक्ति (Moral Reasoning) के आधार पर चरणबद्ध रूप से विकसित होता है।

Q2. कोहलबर्ग के सिद्धांत में कितने स्तर और कितनी अवस्थाएँ हैं?

उत्तर: कोहलबर्ग के सिद्धांत में 3 स्तर (Levels) और 6 अवस्थाएँ (Stages) हैं। ये स्तर क्रमशः पूर्व-परंपरागत (Pre-conventional), परंपरागत (Conventional) तथा उत्तर-परंपरागत (Post-conventional) हैं।

Q3. Heinz Dilemma (हेंज दुविधा) क्या है?

उत्तर: Heinz Dilemma एक नैतिक दुविधा (Moral Dilemma) है, जिसका उपयोग कोहलबर्ग ने व्यक्ति की नैतिक तर्कशक्ति का अध्ययन करने के लिए किया था। इसमें सही या गलत उत्तर से अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि व्यक्ति अपने निर्णय के समर्थन में क्या तर्क देता है।

Q4. Moral Reasoning (नैतिक तर्कशक्ति) क्या है?

उत्तर: Moral Reasoning का अर्थ है किसी नैतिक परिस्थिति में सही और गलत का निर्णय लेने के पीछे व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किए गए तर्क। कोहलबर्ग के अनुसार नैतिक विकास का आधार यही नैतिक तर्कशक्ति है।

Q5. CTET में कोहलबर्ग का सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: CTET, UPTET, Super TET, KVS, DSSSB तथा B.Ed. जैसी परीक्षाओं में कोहलबर्ग के तीन स्तर, छह अवस्थाएँ, Heinz Dilemma, Moral Reasoning तथा पियाजे और कोहलबर्ग के सिद्धांतों में अंतर से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। इसलिए यह सिद्धांत शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

यदि आप CTET, UPTET, Super TET, KVS, DSSSB या B.Ed. की तैयारी कर रहे हैं, तो हमारे CDP के अन्य महत्वपूर्ण नोट्स भी अवश्य पढ़ें। इससे परीक्षा में पूछे जाने वाले सिद्धांतों को समझना और याद रखना आसान होगा।

निष्कर्ष
 कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत बताता है कि बालक का नैतिक विकास उसकी नैतिक तर्कशक्ति के आधार पर चरणबद्ध रूप से विकसित होता है। इस सिद्धांत के तीन स्तर और छह अवस्थाएँ CTET, UPTET, Super TET, KVS, DSSSB तथा B.Ed. जैसी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि अभ्यर्थी Moral Reasoning, Heinz Dilemma और छह अवस्थाओं को अच्छी तरह समझ लेते हैं, तो इस विषय से जुड़े अधिकांश प्रश्न आसानी से हल कर सकते हैं।

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